बिहार से आगे बढ़ी नई टाउन प्लानिंग की राह

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने जिन आरंभिक फैसलों से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा, उसमें नई टाउन प्लानिंग का विजन और उसका चरणबद्ध क्रियान्वनय सबसे अहम है।

इस कारण सैटेलाइट टाउनशिप और इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रियल टाउनशिप जैसे शब्द न सिर्फ चर्चा में आए, बल्कि टाउन प्लानिंग को लेकर विमर्श का नया मुहाना भी खुला। भविष्य की चुनौती, जन-सांख्यिकी के नए रुझानों और मानवीय व्यवहार और सरोकारों में आए परिवर्तनों के मुताबिक नए शहर बसाने की चुनौती निश्चित तौर पर बहुत बड़ी है। लिहाजा इस बारे में गंभीरता से विचार करने और समय से निर्णय लेने की जरूरत है। यह दरकार केंद्र और राज्यों की सरकारों के आगे तो है ही, समाज को भी शहरी रहन-सहन के पूरे परिवेश को नए और जिम्मेदार तरीके से तय करना होगा।

भारत आज दुनिया में सबसे तेजी से शहरीकरण की तरफ बढ़ने वाले देशों में शुमार है। यह विकास की दृष्टि से एक चमकदार बात जरूर हो सकती है, पर इसके साथ जीवन और समाज की कई जरूरतें भी जुड़ी हैं। इन जरूरतों के समाधान के बिना शहरों के विस्तार से देश में संतुलित और समावेशी विकास की चुनौती और बढ़ भी सकती है। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन, रोजगार के नए अवसर, औद्योगिक विस्तार और बदलती जीवनशैली ने देश के शहरी ढांचे पर अभूतपूर्व दबाव पैदा किया है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 तक भारत की लगभग आधी आबादी शहरों में रह रही होगी। लिहाजा नियोजित शहरीकरण अब केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है। ऐसे में इस बात का मूल्यांकन जरूरी है कि क्या भारत के शहर इस तेजी से बढ़ती आबादी को संभालने के लिए तैयार हैं। यह भी कि शहरीकरण को लेकर हमारी समझ और परियोजनाएं क्या इस चुनौती पर खरी उतरती हैं।

हमारे सामने हालिया दशकों के जो अनुभव हैं, उसमें दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे शहर आज विकास के प्रतीक जरूर हैं, लेकिन इनके सामने चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। ट्रैफिक जाम, जानलेवा प्रदूषण, अवैध कॉलोनियां, जल संकट, कचरा कुप्रबंधन, महंगी रिहाइश और घटती हरित भूमि अब लगभग हर बड़े शहर की शिनाख्त बन चुकी है। ज्यादातर शहरों में आलम यह है कि वहां आर्थिक अवसर तो जरूर बढ़े, लेकिन इसके साथ मानवीय जीवन की गुणवत्ता लगातार कमजोर होती गई। इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत में लंबे समय तक शहरीकरण योजनाबद्ध विकास के बजाय जनसंख्या के दबाव में बढ़ता रहा। पहले लोग शहरों में आए, फिर उनके लिए सड़क, पानी, परिवहन और आवास की व्यवस्था खोजी गई। यही कारण है कि महानगरों के आसपास बड़ी संख्या में अव्यवस्थित बस्तियां और अनियोजित विस्तार दिखाई देता है। विशेषज्ञ वर्षों से यह कहते रहे हैं कि यदि भारत को 21वीं सदी की आर्थिक शक्ति बनना है, तो उसे अपने टाउन प्लानिंग के मॉडल को बदलना होगा।

इसी सोच के तहत पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों ने नए शहरी मॉडल पर काम शुरू किया। गुजरात ने गिफ्ट सिटी के माध्यम से वैश्विक वित्तीय केंद्र विकसित करने का प्रयास किया। महाराष्ट्र ने नवी मुंबई और ट्रांस हार्बर परियोजनाओं के जरिए मुंबई का दबाव कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए। उत्तर प्रदेश एक्सप्रेस-वे आधारित औद्योगिक और शहरी कॉरिडोर विकसित कर रहा है। तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक ने आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों के आसपास नियोजित शहरी विस्तार की रणनीति अपनाई। केंद्र सरकार ने भी स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत योजना, पीएम आवास योजना और औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं के माध्यम से आधुनिक शहरी ढांचे को बढ़ावा देने का प्रयास किया।

इस तरह की पहल के बावजूद एक बड़ी चुनौती बनी रही—भारत में शहरों का विकास अक्सर रोजगार, आवास और सामाजिक ढांचे के बीच संतुलन नहीं बना पाया। कई औद्योगिक क्षेत्रों में फैक्ट्रियां तो खड़ी हो गईं, लेकिन श्रमिकों के लिए बेहतर आवास और नागरिक सुविधाएं विकसित नहीं हुईं। दूसरी ओर, कई आवासीय टाउनशिप ऐसे बने जहां रोजगार के अवसर सीमित रहे, जिससे लोग फिर बड़े शहरों की ओर लौटने लगे।

यहीं पर सैटेलाइट टाउनशिप और इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रियल टाउनशिप जैसे मॉडल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सैटेलाइट टाउनशिप का उद्देश्य बड़े शहरों के आसपास ऐसे नियोजित नगर विकसित करना है, जहां आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और परिवहन की सुविधाएं पहले से मौजूद हों। इससे मुख्य शहरों पर आबादी और यातायात का दबाव कम किया जा सकता है। दुनिया के कई देशों ने इस मॉडल को सफलतापूर्वक अपनाया है। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन में बड़े शहरों के आसपास विकसित उपग्रह नगरों ने संतुलित शहरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रियल टाउनशिप इससे एक कदम आगे का मॉडल है। इसमें उद्योगों के साथ-साथ आवास, स्कूल, अस्पताल, स्किल सेंटर, बाजार और सार्वजनिक परिवहन को एकीकृत रूप से विकसित किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल फैक्ट्री स्थापित करना नहीं, बल्कि वर्क-लिव इकोसिस्टम बनाना है, जहां लोगों को रोजगार के साथ गुणवत्तापूर्ण जीवन भी मिल सके।

अच्छी बात है कि भारत में अब यह समझ विकसित हो रही है कि भविष्य का विकास केवल महानगरों पर निर्भर नहीं रह सकता। यदि छोटे और मध्यम शहरों को मजबूत नहीं किया गया, तो महानगरों का दबाव असहनीय हो जाएगा। इसी कारण अब क्षेत्रीय शहरीकरण, मल्टी-सिटी ग्रोथ और आर्थिक क्लस्टर आधारित विकास पर जोर बढ़ रहा है। इसी संदर्भ में बिहार सरकार द्वारा 11 सैटेलाइट टाउनशिप और 12 इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रियल टाउनशिप विकसित करने की पहल भी उल्लेखनीय मानी जा रही है। इसे केवल राज्य स्तरीय परियोजना नहीं, बल्कि संतुलित और नियोजित शहरीकरण की दिशा में एक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। यदि ऐसे मॉडल रोजगार, पर्यावरण, परिवहन और सामाजिक सुविधाओं के संतुलन के साथ विकसित होते हैं, तो वे अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकते हैं।

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